सबसे पहले मै अपने दोस्तों से निवेदन करूँगा कि हिंदी में लिखने के लिए देवनागरी का प्रयोग करें ! अगर आप हिंदी लिखने के लिए रोमन का प्रयोग कर रहे हैं तो जाने अनजाने आप हिंदी के विनाश में योगदान दे रहे हैं क्योंकि ऐसा करने से हमारी आने वाली पीढियां देवनागरी को छोड़कर रोमन में ही हिंदी लिखा करेंगी !
अब बात करतें हैं अपने महान भारत की !
क्या कोई आज "महान भारत" को देख सकता है या दुसरे को दिखला सकता है ?
आज देश में किस चीज़ से आपको महान भारत का अहसास होता है ?
हमारा वर्तमान, हमारी विभिन्न छेत्रों में अनेक असफलताओं की एक निर्मम झांकी प्रस्तुत करती है !
चाहे ये गरीबी हो , भ्रस्टाचार हो, पिछड़ापन हो , बढती जनसंखया हो, या अनेक स्तर पर सामाजिक, नैतिक एवं आर्थिक अपराध !
यहाँ पे हमारे कुछ मित्र हमें सुचना क्रांति में भारतियों के योगदान, भारत कि कथित विकास गाथा , दुनिया के विकास में भारतियों के योगदान कि याद दिलाएंगे !
परन्तु आपको नहीं लगता कि ये काम हम लोगों ने सर्वश्रेष्ठ गुलाम बन कर किया है , ऐसा गुलाम जिसे न अपने स्वर्णिम इतिहास का ज्ञान हो न ही उसमें आत्मगौरव का कोई अहसास ! गुलाम भारतीय , जिसे बनाने का सपना कभी मैकाले ने देखा था !
मेरे विचार से महान भारत आज अस्तित्व में ही नहीं है ! जो भारत आज हम देखते हैं वो अतीत के एक महान राष्ट्र के खंडित अवशेष मात्र हैं !
मै यहाँ भाई अजय जी से अनुरोध करूँगा कि अगर उन्हें आज " महान भारत" दिखलाई पड़ता है तो इसके दर्शन से हमें भी कृतार्थ करें !
अब बात आती है अपने "महान देश" को कोसने की, अपने आप को भारतीय होने पर कोसने की एवं "महान देश की चुन चुन कर बुराइयाँ निकलने की " !
मेरे विचार से अगर हमारे अन्दर कोई कमी , कोई बुराई है तो हमें उसे स्वीकार करने में कोई परेशानी या कोई झिजक नहीं होनी चाहिए !
अगर आज के भारत कि महानता नष्ट हो गयी है , ये अपने स्तर से काफी निचे गिर गया है तो इसे स्वीकार करने में परेशानी क्यों ? इतिहास गवाह है यो देश, समाज या व्यक्ति अपने वर्तमान की समस्यायों से आंखे बंद कर के बीते हुए स्वर्णिम कल के सपनों में खोया रहता है उसका विनाश निश्चित है !
हमारा देश भारत महान था ! हमारे पूर्वज महान थे ! हमारी वैदिक संस्कृति पूर्णत वैज्ञानिक एवं श्रेष्ठ थी ! हम पुरे विश्व के लिए एक आदर्श थे ! लेकिन ये हमारा इतिहास है वर्तमान नहीं !
अब बात करते हैं अपने आपको कोसने कि - मै अपने आप को केवल इसलिए नहीं कोस रहा कि ये विकसित नहीं है या कुछ सुविधाओं से वंचित है ! बल्कि ये कि भारत में जन्म लेने वाले आम आदमी कि आत्मा एक संवेदनहीन, सब कुछ कायरों कि तरह बर्दास्त करते रहने वाले कि हो गयी है , ऐसा नागरिक जो खुद अपने अधिकारों के लिए खड़ा नहीं हो सकता ! देश कि बात तो दूर कि है ! हमारा पुरुसार्थ कहीं खो गया है !
जहां तक भारत महान कि चुन चुन कर बुराइयाँ निकलने कि बात है तो ये सबको पता होना चाहिए कि बिना बीमारी का पता लगाये इलाज संभव नहीं है ! अब ये लोगों पे निर्भर करता है कि वो बीमारी का पता किस उद्देश्य से लगा रहे हैं ? ईलाज करने के लिए या बीमारी का रोना रोने के लिए !
अब सवाल ये उठता है कि महान भारत एवं भारतियों का पतन कैसे एवं क्यों हो गया ?
इस सवाल का उत्तर हमारे इतिहास में झाँकने से मिलेगा ! आप इतिहास का अद्ययन गहराई से करेंगे तो पाएंगे कि हम आज से नहीं हजारों सालों से गुलाम हैं ! कभी वैदिक काल में हम आजाद हुआ करते थे जब हमारी सारी जीवनशैली तार्किक एवं वैज्ञानिक हुआ करती थी ! जब लोगों (आम भारतियों ) को ये पता होता था कि उनके प्रत्येक धार्मिक या आद्यात्मिक कार्य का उद्देश्य एवं उसका उनके जीवन, समाज एवं प्रकृति पर क्या प्रभाव है ! सही मायनों में हम तब "आजाद" थे एवं हमारा देश महान !
उसके बाद हमारी मानसिक गुलामी कि शुरुआत हुई ! ब्राह्मणों में अपनी श्रेष्ठता को हमेशा के लिए सुनिश्चित करने हेतु अनगिनत कर्मकांडों को जबरन लोगों के धर्म एवं जीवन का हिस्सा बना दिया ! यहाँ से तार्किक एवं वैज्ञानिक दृष्टी का लोप होने लगा एवं हम ब्राम्हणों द्वारा बनाये गए कर्मकांडों के अनुसार जीवन जीने लगे !
इसके बाद मुगल एवं अंग्रेज आये ! हम कहते हैं कि उन्होंने हमें अपना गुलाम बनाया परन्तु सच तो ये है कि गुलाम हम पहले से ही थे केवल हमारे मालिक बदल गए ! और हम लोगों में से अधिकांस मानसिक गुलामो ने उन्हें सहजता से स्वीकार कर लिया क्योंकि ये हजारों सालों कि गुलामी हमारी नसों में काफी गहरे खून के साथ दौड़ रही थी एवं आज भी दौड़ रही है !
आश्चर्य नहीं कि १९४७ में अंग्रेजों के जाने के बाद फिर से हम गुलामों के मालिक बदल गए और आज हम नेताओं एवं नौकरशाहों के गुलाम हैं !
भाई अजय जी का कहना है की इन सबकी जड़ें कुछ गिने चुने भारतीय से इंडियन बने लोगों में है !
मुझे ये विचार सुनकर आश्चर्य होता है कि कुछ गिने चुने लोगों के कारण १२५ करोड़ लोगों का देश एक असफल राष्ट्र में तब्दील होता जा रहा है !
मेरे विचार से ऐसा नहीं है ! एक राष्ट्र के रूप में हमारे पतन के लिए हम सब जिम्मेदार हैं एवं कुछ काले अंग्रेजों पर इसकी जिम्मेदारी डाल कर हम अपनी जिम्मेदारी से मुह नहीं मोड़ सकते !
आज हमारा (भारत के आम नागरिक का ) आध्यात्मिक, नैतिक, चारित्रिक, सांस्कृतिक पतन हो गया है , हम अपनी वास्तविक स्थिति से काफी निचे गिर गए हैं ! ये बात कुछ काले अंग्रेजों पे नहीं पुरे देशवाशियों पे लागु होती है !
राजनीती सहित तमाम छेत्र समाज का आइना होते हैं ! जैसा समाज होगा हर छेत्र वैसा ही बनता जायेगा ! आखिर लोग हर छेत्र में इसी समाज से ही तो जा रहे हैं !
इसी सोय हुए एवं भ्रस्ट समाज को जगाने एवं सही राह में लाने का प्रयास कभी स्वामी विवेकानंद ने, कभी महर्षि दयानंद , महर्षि अरविन्द तथा अनेक स्वतान्त्र्ता सेनानियों ने किया था ! आज ये काम बाबा रामदेव कर रहे हैं !
शायद ये इस देश कि नियति थी कि आज तक हम मानसिक गुलामी से आजाद नहीं हो पाए हैं परन्तु इसका ये अर्थ कदापि नहीं है कि हम कभी भी आजाद नहीं हो पाएंगे !
आज हमारा देश महान तो छोड़िए एक देश कहलाने के लिए संघर्ष कर रहा है ! ये अपने पतन के द्वार पे खड़ा है !
परन्तु पतन के बाद ही सृजन होता है ! जब घना अंधकार छा जाये तो सोचना चाहिए सुबह होने वाली है !
लगता है आज अपना देश इसी स्थिति में है !
जहां तक गर्व कि बात है मुझे गर्व है मेरे देश के स्वर्णिम इतिहास पर , अपने महान पूर्वजों पर ! लेकिन आज जब मै वर्तमान को देखता हूँ तो सच में शर्म आती है कि मै इस देश का नागरिक हूँ एवं इस देवभूमि का हमलोगों ने क्या हस्र बना दिया ! यदि हम खामोश होकर चुपचाप सब कुछ देख रहे हैं तो भी हम बराबर के गुन्हेगार हैं एवं इतिहास इसके लिए हमें कभी माफ़ नहीं करेगा !
उम्मीद करता हूँ कि भाई अजय जी, पंकज जी जैसे भाइयों जिन्हें मेरे लेख से असहमति थी शायद मेरे विचार को समझ पायें !
ये एक कायर का मातृभूमि के प्रति विस्वासघात एवं विदेश प् रेम नहीं बल्कि एक देशप्रेमी की महान राष्ट्र की वर्तमान दुर्दसा से उत्त्पन्न पीड़ा थी !
-----अजीत प्रताप सिंह ग्राम अकारु -----------
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