Saturday, June 1, 2013

AKARU209302

(१) संता की गर्लफ्रेंड ने मैसेज भेजा
मैसेजः आई मिस यू
संता ने जवाब भेजाः आई मिस्टर यू …॥

(२) टीचरः क्या महिलाओं को 35 के बाद बच्चे होने चाहिए?
संताः नहीं
टीचर क्यों?
संताः सर 35 बच्चे बहुत अधिक हैं, इससे ज्यादा नहीं होने चाहिए……

(३) एक बार संता हवाई जहाज से मुंबई जा रहा था
जैसे ही हवाई जहाज उड़ा वह चीखने लगा मुंबई…। मुंबई”
एयरहोस्टेसः बी साइलेंट
संताः ओके, उंबई…। उंबई…॥

(४) परीक्षक संता सेः इस पक्षी का पैर देखो और इसका नाम बताओ
संताः मुझे नहीं मालूम
परीक्षकः तुम फेल हो गए, तुम्हारा नाम क्या है?
संताः मेरे पैर देखो और मेरा नाम बताओ…॥

(५) जेलर, संता सेः तुम्हे कल सुबह पांच बजे फांसी दे दी जाएगी।
संताः हा॥हा…हा
जेलरः क्यों हंस रहे हो?
संताः मैं तो उठता ही सुबह नौ बजे हूं।

(६) संताः मुझे एक हथोड़ा और कील चाहिए
दुकानदारः किस लिए चाहिए?
संताः मेरे कंप्यूटर के लिए
दुकानदारः मगर कंप्यूटर में इनका क्या काम?
संताः मुझे कंप्यूटर में विंडो लगानी है……

Hindi Jokes, चुटकुले (पति-पत्नी)

(१) पति - क्यों न आज की चाय बाहर चलकर पी जाए ?
पत्नी - क्यों ? तुम्हें क्या लगता है कि मैं चाय बनाते बनाते थक गई हूं ?
पति - अरे नहीं, दरअसल मैं ही कप प्लेट धोते-धोते तंग आ गया हूं …।

(२) मीना और टीना दो सहेलियां काफी अरसे बाद मिलीं ।
मीना - जब तेरा तलाक हुआ था तब तो एक ही बच्चा था, और अब तीन कैसे ?
टीना - दरअसल वो कभी कभी माफी मांगने आ जाते थे …॥

(३) पति - हिप्नोटाइज करना क्या होता है ?
पत्नी - किसी को अपने कंट्रोल में करके अपनी मर्जी के काम करवाना ।
पति - चल झूठी ! उसे तो शादी कहते हैं …..

Hindi Jokes, चुटकुले (डाक्टर)

(१) एक औरत बड़ी हड़बड़ी में दंत चिकित्सक के क्लीनिक में पहुंची।

बोली- डॉक्टर साहब! मैं बहुत जल्दी में हूं। मुझे एक जरूरी मीटिंग में जाना है इसलिए एनस्थीसिया मत लगाइये और जल्दी से दांत बाहर निकाल दीजिये।

डॉक्टर ने मन ही मन कहा- कमाल की औरत है! फिर उस औरत से बोला- ठीक है, जैसी आपकी मर्जी। इस कुर्सी पर बैठ जाइये और बताइये कौन से दांत में दर्द है।

औरत ने दरवाजे के पास खड़े अपने पति को आवाज दी- चलो! डॉक्टर साहब को दांत दिखाओ।

(२) एक पागल खाने में पागल नाच रहे थे॥
एक पागल खामोश बैठा था।

डॉक्टर (पागल से)- तुम खामोश क्यों बैठे हो?
पागल (डॉक्टर से)- बेवकूफ मैं दूल्हा हूं।

(३) पप्पू (डॉक्टर से)- आपको टांके लगाने आते हैं।
डॉक्टर (पप्पू से)- हां आते है, कहा लगाने हैं?
पप्पू- ये लो मेरी चप्पल में लगा दो।

(४) डॉक्टर (मरीज से)- फिर से पेट में तकलीफ मैंने बाहर का खाना मना किया था।
मरीज- लेकिन मैं तो बाहर गया ही नहीं।
डॉक्टर- फिर ये कैसे हुआ?
मरीज- मैंने तो दो लार्ज पिज्जा घर पर ही ऑर्डर किए थे।

(५) डॉक्टर (पप्पू से)- आपका वजन कितना है?
पप्पू (डॉक्टर से)- चश्मे के साथ 75 किलो।
डॉक्टर- और चश्मे के बगैर।
पप्पू- दिखता ही नहीं।

Hindi Jokes, चुटकुले (पति पत्नी)

(१) एक युवक ने अपनी नवविवाहिता पत्नी को घर लाते ही थप्पड़ लगा दिया।
पत्नी (घबराकर पति से)- मैंने क्या किया?
पति (पत्नी से)- तुम्हें ये बताने के लिए कि जब वजह होगी तब क्या होगा।

(२) पति (पत्नी से)- अगर देश की सरकार मेरे हाथ में आ जाए तो सब बदल दूंगा।
पत्नी (पति से)- तुम पहले अपना पजामा बदल लो सुबह से उल्टा पहना हुआ है।

(३) पत्नी (पति से)- कल रात तुम नींद में मुझे गालियां दे रहे थे।
पति (पत्नी से)- तुम्हें गलतफहमी हुई है।
पत्नी- कैसी गलतफहमी?
पति- यही की मैं सोया हुआ था…॥।

(४) पति (पत्नी से)- हटा लो अपने चेहरे से ये जुल्फे ए जाने तमन्ना खुदा कसम अगली बार खाने में बाल आया तो सजनी से गजनी बना दूंगा।

Hindi Jokes, चुटकुले (बच्चे)

(१) पिंटू (चिंटू से)- ये कैसे पता चलेगा कि सामने जो जानवर है वह बकरा है या बकरी।
चिंटू (पिंटू से)- सिंपल है, उसको पत्थर मारना यदि वह भागा तो बकरा और भागी तो बकरी।

(२) बच्चा अपनी दादी से, दादी आपने कौन-कौन से मुल्क घूमे हैं?
दादी- बेटा पाकिस्तान, हिन्दुस्तान और अफगानिस्तान
बच्चा- अब कौन सा घूमेंगी॥
पीछे से दादा बोले- कब्रिस्तान

(३) चिंटू - मां एक गिलास पानी देना।
मां- खुद ले लो॥
चिंटू- प्लीज दे दो॥
मां- अब मांगा तो थप्पड़ दूंगी।
चिंटू- जब थप्पड़ देने आओगी तो पानी लेते आना।

(४) अध्यापक (चिंटू से)- बिजली कहां से आती है?
चिंटू (अध्यापक से)- मामा के घर
अध्यापक- वो कैसे?
चिंटू- क्योंकि जब भी बिजली जाती है पापा कहते है सालों ने फिर काट दी!

(५) राजू (डॉक्टर से)- लगता है मैं अंधा हो गया हूं।
डॉक्टर ने राजू की आखों को चेक किया और कहा नही बेटा तुम्हारी आखें तो ठीक है।
राजू- तो फिर अखबार में मुझे पास छात्रों की लिस्ट में मेरा रोल नंबर क्यों नजर नही आ रहा है?

Wednesday, October 24, 2012

भारत का राष्‍ट्रीय वृक्ष है बरगद,


बरगद (अंग्रेज़ी:Banyan Treeभारत का राष्‍ट्रीय वृक्ष है। बरगद को बर, बट या वट भी कहते हैं। बरगद मोरेसी या शहतूत कुल का पेड़ है। इसका वैज्ञानिक नाम 'फ़ाइकस वेनगैलेंसिस (Ficus bengalensis) और अंग्रेज़ी नाम बनियन ट्री (Banyan tree) है। हिंदू लोग इस वृक्ष को पूजनीय मानते हैं। इसके दर्शन स्पर्श तथा सेवा करने से पाप दूर होता है तथा दु:ख और व्याधि नष्ट होती है। अत: इस वृक्ष के रोपण और ग्रीष्म काल में इसकी जड़ में पानी देने से पुण्यसंचय होता है, ऐसा माना जाता है। उत्तर से दक्षिण तक समस्त भारत में वट वृक्ष उत्पन्न होते देखा जाता है। इसकी शाखाओं से बरोह निकलकर ज़मीन पर पहुंचकर स्तंभ का रूप ले लेती हैं। इससे पेड़ का विस्तार बहुत ज़ल्द बढ़ जाता है।

विशेषता

भारत में बरगद के दो सबसे बड़े पेड़ कोलकाता के राजकीय उपवन में और महाराष्ट्र के सतारा उपवन में हैं। शिवपुर के वटवृक्ष की मूल जड़ का घेरा 42 फुट और अन्य छोटे छोटे 230 स्तंभ हैं। इनकी शाखा प्रशाखाओं की छाया लगभग 1000 फुट की परिधि में फैली हुई है। सतारा के वट वृक्ष, 'कबीर वट', की परिधि 1,587 फुट और उत्तर-दक्षिण 565 फुट और पूरब-पश्चिम 442 फुट है। लंका में एक वट वृक्ष है, जिसमें 340 बड़े और 3000 छोटे - छोटे स्तंभ हैं। बरगद की छाया घनी, बड़ी, शीतल और ग्रीष्म काल में आनंदप्रद होती है। इसकी छाया में सैकड़ों, हज़ारों व्यक्ति एक साथ बैठ सकते हैं। बरगद के फल पीपल के फल सदृश छोटे छोटे होते हैं। साधारणतया ये फल खाए नहीं जाते पर दुर्भिक्ष के समय इसके फलन पर लोग निर्वाह कर सकते हैं। इसकी लकड़ी कोमल और सरंध्र होती है। अत: केवल जलावन के काम में आती है। इसके पेड़ से सफेद रस निकलता है जिससे एक प्रकार का चिपचिपा पदार्थ तैयार होता है जिसका उपयोग बहेलिए चिड़ियों के फँसाने में करते हैं। इसके रस (आक्षीर), छाल, और पत्तों का उपयोग आयुर्वेदीय ओषधियों में अनेक रोगों के निवारण में होता है। इसके पत्तों को जानवर, विशेषत: बकरियाँ, बड़ी रुचि से खाती हैं। वृक्ष पर लाख के कीड़े बैठाए जा सकते हैं जिससे लाख प्राप्त हो सकती है।[1]

पौराणिक मान्यता

बरगद के वृक्ष
भारत में बरगद के वृक्ष को एक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इस वृक्ष को 'वट' के नाम से भी जाना जाता है। यह एक सदाबहार पेड़ है, जो अपने प्ररोहों के लिए विश्वविख्यात है। इसकी जड़ें ज़मीन में क्षैतिज रूप में दूर-दूर तक फैलकर पसर जाती है। इसके पत्तों से दूध जैसा पदार्थ निकलता है। यह पेड़ त्रिमूर्ति का प्रतीक है। इसकी छाल में विष्णु, जड़ों में ब्रह्मा और शाखाओं में शिव विराजते हैं।अग्निपुराण के अनुसार बरगद उत्सर्जन को दर्शाता है। इसीलिए संतान के लिए इच्छित लोग इसकी पूजा करते हैं। इस कारण से बरगद काटा नहीं जाता है। अकाल में इसके पत्ते जानवरों को खिलाए जाते हैं। अपनी विशेषताओं और लंबे जीवन के कारण इस वृक्ष को अनश्‍वर माना जाता है। इसीलिए इस वृक्ष को अक्षयवट भी कहा जाता है। लोक मान्यता है कि बरगद के एक पेड़ को काटे जाने पर प्रायश्चित के तौर पर एक बकरे की बलि देनी पड़ती है। वामनपुराण में वनस्पतियों की व्युत्पत्ति को लेकर एक कथा भी आती है। आश्विन मास में विष्णु की नाभि से जब कमल प्रकट हुआ, तब अन्यदेवों से भी विभिन्न वृक्ष उत्पन्न हुए। उसी समय यक्षों के राजा 'मणिभद्र' से वट का वृक्ष उत्पन्न हुआ।
यक्षाणामधिस्यापि मणिभद्रस्य नारद।
वटवृक्ष: समभव तस्मिस्तस्य रति: सदा।।

पौराणिक वर्णन

यक्ष से निकट सम्बन्ध के कारण ही वट वृक्ष को 'यक्षवास', 'यक्षतरु', 'यक्षवारूक' आदि नामों से भी पुकारा जाता है। पुराणों में ऐसी अनेक प्रतीकात्मक कथाएँ, प्रकृति, वनस्पति व देवताओं को लेकर मिलती हैं। जिस प्रकार अश्वत्थ अर्थात् पीपल को विष्णु का प्रतीक कहा गया, उसी प्रकार इस जटाधारी वट वृक्ष को साक्षात जटाधारी पशुपति शंकर का रूप मान लिया गया है। स्कन्दपुराण में कहा गया है-
बरगद के वृक्ष, कोलकाता
अश्वत्थरूपी विष्णु: स्याद्वरूपी शिवो यत:
अर्थात् पीपलरूपी विष्णु व जटारूपी शिव हैं।
  • हरिवंश पुराण में एक विशाल वृक्ष का वर्णन आता है, जिसका नाम 'भंडीरवट' था और उसकी भव्यता से मुग्ध हो स्वयं भगवान ने उसकी छाया में विश्राम किया।
न्यग्रोधर्वताग्रामं भाण्डीरंनाम नामत:।
दृष्ट्वा तत्र मतिं चक्रे निवासाय तत: प्रभु:।।
  • 'सुभद्रवट' नाम से एक और वट वृक्ष का भी वर्णन मिलता है, जिसकी डाली गरुड़ ने तोड़ दी थी।रामायण के अक्षयवट की कथा तो लोक प्रचलित है ही। परन्तु वाल्मीकि रामायण में इसे 'श्यामन्यग्रोध' कहा गया है। यमुना के तट पर वह वट अत्यन्त विशाल था। उसकी छाया इतनी ठण्डी थी कि उसे 'श्यामन्योग्राध' नाम दिया गया। श्याम शब्द कदाचित वृक्ष की विशाल छाया के नीचे के घने अथाह अंधकार की ओर संकेत करता है और गहरे रंग की पत्रावलि की ओर। रामायण के परावर्ति साहित्य में इसका अक्षयवट के नाम से उल्लेख मिलता है। रामलक्ष्मण और सीता अपने वन प्रवास के समय जब यमुना पार कर दूसरे तट पर उतरते हैं, तो तट पर स्थित इस विशाल वट वृक्ष को सीता प्रणाम करती हैं।

महत्त्वपूर्ण तथ्य

बरगद का वृक्ष
  • बरगद भारत का 'राष्‍ट्रीय वृक्ष' (फ़ाइकस वेनगैलेंसिस) है।
  • बरगद के वृक्ष की शाखाएँ दूर-दूर तक फैली तथा जड़ें गहरी होती हैं। इतनी गहरी जड़ें किसी और वृक्ष की नहीं होती हैं।
  • जड़ों और अधिक तने से शाखाएँ बनती हैं और इस विशेषता और लंबे जीवन के कारण इस वृक्ष को अनश्‍वर माना जाता है।
  • वट, यानी बरगद को 'अक्षय वट' भी कहा जाता है, क्योंकि यह पेड कभी नष्ट नहीं होता है।
  • अब भी बरगद के वृक्ष को ग्रामीण जीवन का केंद्र बिन्‍दु माना जाता है और आज भी गांव की परिषद इसी पेड़ की छाया में पंचायत करती है।

Monday, September 17, 2012

**हिंदी में लिखने के लिए देवनागरी का प्रयोग करें**


                  सबसे पहले मै अपने दोस्तों से निवेदन करूँगा कि हिंदी में लिखने के लिए देवनागरी का प्रयोग करें ! अगर आप हिंदी लिखने के लिए रोमन का प्रयोग कर रहे हैं तो जाने अनजाने आप हिंदी के विनाश में योगदान दे रहे हैं क्योंकि ऐसा करने से हमारी आने वाली पीढियां देवनागरी को छोड़कर रोमन में ही हिंदी लिखा करेंगी !
    अब बात करतें हैं अपने महान भारत की !
     क्या कोई आज "महान भारत" को देख सकता है या दुसरे को दिखला सकता है ?
                आज देश में किस चीज़ से आपको महान भारत का अहसास होता है ?
                 हमारा वर्तमान, हमारी विभिन्न छेत्रों में अनेक असफलताओं की एक निर्मम झांकी प्रस्तुत करती है !
चाहे ये गरीबी हो , भ्रस्टाचार हो, पिछड़ापन हो , बढती जनसंखया हो, या अनेक स्तर पर सामाजिक, नैतिक एवं आर्थिक अपराध !
                यहाँ पे हमारे कुछ मित्र हमें सुचना क्रांति में भारतियों के योगदान, भारत कि कथित विकास गाथा , दुनिया के विकास में भारतियों के योगदान कि याद दिलाएंगे !
परन्तु आपको नहीं लगता कि ये काम हम लोगों ने सर्वश्रेष्ठ गुलाम बन कर किया है , ऐसा गुलाम जिसे न अपने स्वर्णिम इतिहास का ज्ञान हो न ही उसमें आत्मगौरव का कोई अहसास ! गुलाम भारतीय , जिसे बनाने का सपना कभी मैकाले ने देखा था !
               मेरे विचार से महान भारत आज अस्तित्व में ही नहीं है ! जो भारत आज हम देखते हैं वो अतीत के एक महान राष्ट्र के खंडित अवशेष मात्र हैं !
मै यहाँ भाई अजय जी से अनुरोध करूँगा कि अगर उन्हें आज " महान भारत" दिखलाई पड़ता है तो इसके दर्शन से हमें भी कृतार्थ करें !
अब बात आती है अपने "महान देश" को कोसने की, अपने आप को भारतीय होने पर कोसने की एवं "महान देश की चुन चुन कर बुराइयाँ निकलने की " !
                         मेरे विचार से अगर हमारे अन्दर कोई कमी , कोई बुराई है तो हमें उसे स्वीकार करने में कोई परेशानी या कोई झिजक नहीं होनी चाहिए !
अगर आज के भारत कि महानता नष्ट हो गयी है , ये अपने स्तर से काफी निचे गिर गया है तो इसे स्वीकार करने में परेशानी क्यों ? इतिहास गवाह है यो देश, समाज या व्यक्ति अपने वर्तमान की समस्यायों से आंखे  बंद कर के बीते हुए स्वर्णिम कल के सपनों में खोया रहता है उसका विनाश  निश्चित है !
हमारा देश भारत महान था ! हमारे पूर्वज महान थे ! हमारी वैदिक संस्कृति पूर्णत वैज्ञानिक एवं श्रेष्ठ थी ! हम पुरे विश्व के लिए एक आदर्श थे ! लेकिन ये हमारा इतिहास है वर्तमान नहीं !
अब बात करते हैं अपने आपको कोसने कि - मै अपने आप को केवल इसलिए नहीं कोस रहा कि ये विकसित नहीं है या कुछ सुविधाओं से वंचित है ! बल्कि ये कि भारत में जन्म लेने वाले आम आदमी कि आत्मा एक संवेदनहीन, सब कुछ कायरों कि तरह बर्दास्त करते रहने वाले कि हो गयी है , ऐसा नागरिक जो खुद अपने अधिकारों के लिए खड़ा नहीं हो सकता ! देश कि बात तो दूर कि है ! हमारा पुरुसार्थ कहीं खो गया है !
जहां तक भारत महान कि चुन चुन कर बुराइयाँ निकलने कि बात है तो ये सबको पता होना चाहिए कि बिना बीमारी का पता लगाये इलाज संभव नहीं है ! अब ये लोगों पे निर्भर करता है कि वो बीमारी का पता किस उद्देश्य से लगा रहे हैं ? ईलाज करने के लिए या बीमारी का रोना रोने के लिए !
                           अब सवाल ये उठता है कि महान भारत एवं भारतियों का पतन कैसे एवं क्यों हो गया ?
इस सवाल का उत्तर हमारे इतिहास में झाँकने से मिलेगा ! आप इतिहास का अद्ययन गहराई से करेंगे तो पाएंगे कि हम आज से नहीं हजारों सालों से गुलाम हैं ! कभी वैदिक काल में हम आजाद हुआ करते थे जब हमारी सारी जीवनशैली तार्किक एवं वैज्ञानिक हुआ करती थी ! जब लोगों (आम भारतियों ) को ये पता होता था कि उनके प्रत्येक धार्मिक या आद्यात्मिक कार्य का उद्देश्य एवं उसका उनके जीवन, समाज एवं प्रकृति पर क्या प्रभाव है ! सही मायनों में हम तब "आजाद"  थे एवं हमारा देश महान !
उसके बाद हमारी मानसिक गुलामी कि शुरुआत हुई ! ब्राह्मणों में अपनी श्रेष्ठता को हमेशा के लिए सुनिश्चित करने हेतु अनगिनत कर्मकांडों को जबरन लोगों के धर्म एवं जीवन का हिस्सा बना दिया ! यहाँ से तार्किक एवं वैज्ञानिक दृष्टी का लोप होने लगा एवं हम ब्राम्हणों द्वारा बनाये गए कर्मकांडों के अनुसार जीवन जीने लगे !
इसके बाद मुगल एवं अंग्रेज आये ! हम कहते हैं कि उन्होंने हमें अपना गुलाम बनाया परन्तु सच तो ये है कि गुलाम हम पहले से ही थे केवल हमारे मालिक बदल गए ! और हम लोगों में से अधिकांस मानसिक गुलामो ने उन्हें सहजता से स्वीकार कर लिया क्योंकि ये हजारों सालों कि गुलामी हमारी नसों में काफी गहरे खून के साथ दौड़ रही थी एवं आज भी दौड़ रही है !
आश्चर्य नहीं कि १९४७ में अंग्रेजों के जाने के बाद फिर से हम गुलामों के मालिक बदल गए और आज हम नेताओं एवं नौकरशाहों के गुलाम हैं !
भाई अजय जी का कहना है की इन सबकी जड़ें कुछ गिने चुने भारतीय से इंडियन बने लोगों में है !
मुझे ये विचार सुनकर आश्चर्य होता है कि कुछ गिने चुने लोगों के कारण १२५ करोड़ लोगों का देश एक असफल राष्ट्र में तब्दील होता जा रहा है !
मेरे विचार से ऐसा नहीं है ! एक राष्ट्र के रूप में हमारे पतन के लिए हम सब जिम्मेदार हैं एवं कुछ काले अंग्रेजों पर इसकी जिम्मेदारी डाल  कर हम अपनी जिम्मेदारी से मुह नहीं मोड़ सकते !
आज हमारा (भारत के आम नागरिक का ) आध्यात्मिक, नैतिक, चारित्रिक, सांस्कृतिक पतन हो गया है , हम अपनी वास्तविक स्थिति से काफी निचे गिर गए हैं ! ये बात कुछ काले अंग्रेजों पे नहीं पुरे देशवाशियों पे लागु होती है !
राजनीती सहित तमाम छेत्र समाज का आइना होते हैं ! जैसा समाज होगा हर छेत्र वैसा ही बनता जायेगा ! आखिर लोग हर छेत्र में इसी समाज से ही तो जा रहे हैं !
इसी सोय हुए एवं भ्रस्ट समाज को जगाने एवं सही राह में लाने का प्रयास कभी स्वामी विवेकानंद ने, कभी महर्षि दयानंद , महर्षि अरविन्द तथा अनेक स्वतान्त्र्तासेनानियों ने किया था  ! आज ये काम बाबा रामदेव कर रहे हैं ! 
शायद ये इस देश कि नियति थी कि आज तक हम मानसिक गुलामी से आजाद नहीं हो पाए हैं परन्तु इसका ये अर्थ कदापि नहीं है कि हम कभी भी आजाद नहीं हो पाएंगे !
आज हमारा देश महान तो छोड़िए एक देश कहलाने के लिए संघर्ष कर रहा है ! ये अपने पतन के द्वार पे खड़ा है !
परन्तु पतन के बाद ही सृजन होता है ! जब घना अंधकार छा जाये तो सोचना चाहिए सुबह होने वाली है !
लगता है आज अपना देश इसी स्थिति में है !  
जहां तक गर्व कि बात है मुझे गर्व है मेरे देश के स्वर्णिम इतिहास पर , अपने महान पूर्वजों पर ! लेकिन आज जब मै वर्तमान को देखता हूँ तो सच में शर्म आती है कि मै इस देश का नागरिक हूँ एवं इस देवभूमि का हमलोगों ने क्या हस्र बना दिया ! यदि हम खामोश होकर चुपचाप सब कुछ देख रहे हैं तो भी हम बराबर के गुन्हेगार हैं एवं इतिहास इसके लिए हमें कभी माफ़ नहीं करेगा !   
                     उम्मीद करता हूँ कि भाई अजय जी, पंकज जी जैसे भाइयों जिन्हें मेरे लेख से असहमति थी शायद मेरे विचार को समझ पायें !
ये एक कायर का मातृभूमि के प्रति विस्वासघात एवं विदेश प्रेम नहीं बल्कि एक देशप्रेमी की महान राष्ट्र की वर्तमान दुर्दसा से उत्त्पन्न पीड़ा थी !

                                          -----अजीत प्रताप सिंह ग्राम अकारु -----------